मसूद अज़हर पर प्रतिबंध के लिए प्रस्ताव लाएगा फ्रांस

जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी (ग्लोबल टेररिस्ट) घोषित करवाने के लिए फ्रांस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव लाएगा.

द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रों के कूटनीतिक सलाहकार ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को फ़ोन पर ये जानकारी दी है.

लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन का रुख अहम होगा क्योंकि इससे पहले वो वीटो ला कर ऐसा करने की कोशिशों में रुकावटें पैदा कर चुका है. हालांकि, फ्रांस का ये क़दम यदि कामयाब हुआ तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं.

द हिंदू में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक वेबसाइट कोबरापोस्ट ने एक स्टिंग ऑपरेशन करके दावा किया है कि बॉलीवुड के 36 सेलिब्रिटी पैसों के बदले राजनीतिक पार्टियों के लिए प्रचार करने के लिए तैयार थे.

स्टिंग में दावा किया गया है कि ये सितारे पैसों के बदले लोकसभा चुनावों से पहले अपने सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल पर राजनीतिक पार्टियों के लिए पोस्ट करने के लिए राज़ी थे.

इस स्टिंग ऑपरेशन के लिए एक काल्पनिक जनसंपर्क एजेंसी के प्रतिनिधि बनकर कोबरापोस्ट के रिपोर्टरों ने कई गायकों, अभिनेताओं और अभिनेत्रियों से संपर्क किया. कुछ सितारों ने तो एक संदेश पोस्ट करने के बदले पचास लाख रुपए तक भी मांगे.

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़ कश्मीर के पुलवामा में चरमपंथियों के साथ हुई मुठभेड़ में आम नागरिकों को बचाने की वजह से सैन्यबलों को भारी क्षति उठानी पड़ी है.

इस मुठभेड़ में सेना के मेजर वीएस ढोंडियाल समेत पांच जवानों की मौत हुई हैं. लेफ़्टिनेंट जनरल जेएस ढिल्लन ने एक प्रेस वार्ता में इसकी जानकारी दी है.

द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस पार्टी मार्च की शुरुआत में अपने चुनावी अभियान में तेज़ी लाएगी. कांग्रेस अपना अभियान बीजेपी की वादा ख़िलाफ़ी और नाकामियों पर केंद्रित करेगी.

कांग्रेस ने इसके लिए कई नारे भी तय किए हैं - "बंदे में है दम, साथ चलेंगे हम," "अब इस बार सोच समझ के", "बहुत हुई जुमलों की मार, आओ बदलें मोदी सरकार".

चुनावी रणनीति से जुड़े लोगों के मुताबिक़ कांग्रेस पहली बार वोट डालने जा रहे युवाओं पर सबसे ज़्यादा ध्यान केंद्रित करेगी.

जिस तरह पाकिस्तानी अपने मुल्क को देखते हैं, ज़रूरी तो नहीं कि बाक़ी दुनिया भी पाकिस्तान को वैसे ही देखे. इसी तरह जैसे हिन्दुस्तानी भारत को देखते हैं, ज़रूरी तो नहीं कि विदेशी भी भारत को इसी दृष्टि से देखें.

जनता की भावनाएं, मीडिया के एक्शन से भरपूर मांगें, नेताओं के मुंह से निकलने वाले झाग अपनी जगह, मगर सरकारों को किसी भी एक्शन या रिएक्शन से पहले दस तरह की और चीज़ें भी सोचनी पड़ती हैं.

अब पुलवामा के घातक हमले को ही ले लें. या इससे पहले पठानकोट और उड़ी की घटना या 2008 के मुंबई हमले या 1993 के मुंबई में दर्जन भर बम विस्फोटों से फैली बर्बादी. सबूत, ताना-बाना और ग़ुस्सा अपनी-अपनी जगह मगर इसके बाद क्या?

युद्ध होना होता तो 13 दिसंबर 2001 को हो जाना चाहिए था जब लोकसभा बिल्डिंग पर चरमपंथी हमला हुआ था.

दो दिन बाद रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से सेना को मार्चिंग ऑर्डर मिल चुके थे. 1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद पाकिस्तान से मिली सीमा पर भारतीय सेना की ये सबसे बड़ी तैनाती थी.

दोनों तरफ़ की फ़ौजें पंजाब से गुजरात तक एक दूसरे के दीदों में दीदें डाली घूरती रहीं और फिर 8000 करोड़ रुपये ख़र्च करने के बाद सेना डेढ़ वर्ष के बाद अगले मोर्चों से वापिस.

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